अल्मोड़ा। उत्तराखण्ड के पहाड़ी जनपदों में स्वाथ्य सेवाएं बदहाल है। राज्य गठन के 25 वर्ष गुजरजाने के बाद भी स्थिति जस के तस बनी हुई है। अल्मोड़ा जिले के सल्ट ब्लॉक के इनोलू गांव की गर्भवती महिला को समय पर इलाज न मिलने के कारण दो मासूम जुड़वा बच्चों समेत जान काल के ग्रास में समा गयी। इस हृदयविदारक घटना ने सरकार और प्रशासन के सभी दावों की पोल खोलकर रख दी है।
इनोलू गांव की रहने वाली 24 वर्षीय गर्भवती निशा को अचानक सांस लेने में तकलीफ होने लगी थी। घबराए परिजन उन्हें तुरंत नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र ले जाने के बजाए 31 अगस्त को सीधे रामनगर अस्पताल लेकर पहुंचे।
अस्पताल में समुचित व्यवस्थाएं न होने के कारण डॉक्टरों ने निशा को हायर सेंटर हल्द्वानी के लिए रेफर कर दिया। इसके बाद बेबस परिजन निशा को लेकर हल्द्वानी और काशीपुर के कई सरकारी व निजी अस्पतालों के चक्कर काटते रहे, लेकिन हर जगह उन्हें निराशा ही हाथ लगी।
घंटों तक चले इस इलाज की तलाश और भटकाव के बाद, आखिरकार परिजन 2 सितंबर को निशा को काशीपुर के एक निजी अस्पताल में ले गए। लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी।
अस्पताल में इलाज के दौरान निशा की हालत लगातार बिगड़ती गई और उसने दम तोड़ दिया। डॉक्टरों ने ऑपरेशन के जरिए निशा के गर्भ में पल रहे जुड़वा बच्चों को बाहर निकाला। इनमें से एक बच्चा पहले ही दम तोड़ चुका था। दूसरे बच्चे ने भी कुछ ही घंटों के भीतर दम तोड़ दिया। एक साथ तीन जिंदगियों की मौत से परिवार में कोहराम मच गया है।
निशा के ससुर राजू टम्टा ने व्यवस्था पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते हमारी बहू को सही अस्पताल और समुचित उपचार मिल जाता, तो आज ये तीनों जिंदगियां हमारे बीच सुरक्षित होतीं।
उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था को भ्रष्टाचार और लापरवाही का दीमक लग चुका है। यहां की पूरी व्यवस्था सड़ चुकी है। राज्य की गरीब जनता को इसकी कीमत अपनी और अपने अपनों की जान देकर चुकानी पड़ रही है। चैंकाने वाली बात ये है कि ये मामला करीब 12 दिन बात सामने आया है।
